भवानी मंदिर- आसेगांव देवी

भारत विविधताओं भरा देश है। यहां की हर जगह कुछ खासियत समेटे हुए है। ऐसा ही एक मंदिर यवतमाल के आसेगांव देवी में स्थित है। इस मंदिर की कहानी शिवाजी महाराज (१६२७-१६८०) के दौरान की है। यवतमाल के ब्राह्मणवाड़ा इलाके में मुगलों का हस्तक्षेप बढ़ने के चलते मंदिर तोड़े जा रहे थे। उस दौरान कुछ ब्राह्मण कुछ देवी प्रतिमाओं को बचाकर आसेगांव देवी में ले आए। उन्होंने आसेगांव में नीम के पेड़ के नीचे इन मूर्तियों को रख दिया और खुद भाग गए। कई साल इन प्रतिमाओं की वहीं नीम के पेड़ के नीचे पूजा होती रही।
काफी साल बाद वहीं पर एक छोटा सा कमरा बनाकर प्रतिमाओं को स्थापित कर दिया गया। कालांतर में यही कमरा पक्का कर दिया गया लेकिन उसे मंदिर की शक्ल नहीं दी गई। इसमें गुंबद भी नहीं था।

करीब ४० साल पहले आसेगांव में कोई पिंपळे थे। उनकी बेटी की शादी नहीं हो रही थी। उन्होंने देवी के कमरे में टाइल्स लगवा दी। उनकी बेटी की शादी हो गई। इसके बाद एक अन्य पुरुषोत्तम बलवंत पिंपळे (सतीश पिंपळे- डायरेक्टर प्रदेश टुडे के पिता) भी इस मंदिर में पूजा करने के लिए जाते थे। प्रतिमाएं करीब ३०० साल पुरानी थी लिहाजा उनका क्षरण हो रहा था। पूजा करते वक्त पुरुषोत्तम पिंपळे की उंगलियों में प्रतिमाओं की मिट्टी लगती थी। इसके चलते उन्हें बेटे सतीश से प्रतिमाओं के पुनरुद्धार और मंदिर के जीर्णोद्धार की इच्छा जताई।

सतीश ने २०१३ में मंदिर के जीर्णोद्धार करने का प्रण किया। उन्होंने मंदिर के सामने एक अन्य व्यक्ति से पैंसठ हजार रुपए में ६०० वर्गफीट जगह खरीदी और इसी साल अक्टूबर-नवंबर में मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया। मंदिर निर्माण का जिम्मा सतीश ने अपने भांजे विजय जोशी को सौंपा। मार्च २०१४ में महज ६ दिन में ३५ फीट के गुंबद का काम पूरा हो गया। २७ मार्च २०१४ को प्रतिमाओं की पुनर्स्थापना की गई। इन सबमें बड़ी बात यह कि जिस दौरान सतीश ने मंदिर पुनर्निर्माण का सोचा, उसी समय उनकी पत्नी गर्भवती हुई। २९ जुलाई २०१४ को सतीश की पत्नी ने बेटी को जन्म दिया। मंदिर में पूजा करने वाले को लोग भगत और उनके परिवार को भगतजी का परिवार कहते हैं। उनके वहां ८-१० मकान हैं।

फाल्गुन महीना(२०१४) की द्वादशी को मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। तब से अब तक हर साल इस दिन बड़े स्तर पर पूजा और भंडारे का आयोजन होता है। एकादशी के दिन देव आह्वान किया जाता है, इसे गोंधळ कहते हैं। इसमें भजन गाकर देवों को शुभकार्य के लिए बुलाया जाता है। द्वादशी के दिन देवी का अभिषेक और नवचंडी यज्ञ होता है। इस दिन ब्राह्मण भोज और कुमारी भोज होता है।

त्रयोदशी के दिन पूरे गांव (करीब ३ हजार लोग) का भोज होता है। भोज शुरू होने से पहले दो घंटे गोपाल काला (भगवान कृष्ण) का भजन होता है।११ बजे से भंडारा शुरू होता है। अब मंदिर में रोज पूजा होती है। हर पूर्णिमा, चैत्र-कार्तिक नवरात्रि और मंदिर के जीर्णोद्धार (फाल्गुन द्वादशी) के दिन बड़ा समारोह होता है। २०१४ से अब तक द्वादशी तिथि पर ६ समारोह हो चुके हैं। यह कार्यक्रम हर साल बढ़ता जा रहा है। मंदिर के बगल में ही एक हजार वर्गफीट (एक लाख पैंसठ हजार की) जगह लेकर भक्तों-पुजारी के रहने के लिए व्यवस्था की जा रही है। लिव केयर फाउंडेशन के तहत कई सामाजिक काम भी किए जा रहे हैं।